Friday, December 24, 2010

पाऊस-प्रथमऋतू

Preamble...
This is just a dialogue between a poet and a scientist! By using a metaphorical platform of a “Chessboard” Gulzar sahaab here is showcasing the strength of a poet’s thought over any rational entity.  This is a sheer example of poet’s ability to look beyond the obvious. We feel the overall concept of challenging ‘Science’ through poetry is fascinating! 




पूरे के पूरा आकाश घुमाकर देखी बाजी मैने...


काले घर मै सूरज रखके तुमने शायद सोचा था,
मेरे सारे के सारे मोहरे पिट जायेंगे,
मैने एक चराग जलाकर रोशनी कर ली
अपना रस्ता खोज लिया...


तुमने समंदर हाथ मै रखकर उसपर ढेल दिया,
मैने नौह की कश्ती उसके उपर रख दी...


काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा,
मैने काल को तोडके लम्हा लम्हा जीना सीख लिया...


मेरी खुदीको तुमने चंद चमत्कारोसे मारना चाहा,
मेरे एक प्यादेने चलते चलते चलते तेरे चांद का मोहरा मार लिया...


मौत की शह देकर तुमने समझा था अब तो मात हुई,
मैने जिस्म का खोल उतारकर सौप दिया,
अपनी रूह बचा ली


पुरे का पुरा आकाश घुमाकर... अब तुम देखो बाजी


-गुलजार

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