Wednesday, April 8, 2015

सोचा नही अच्छा बुरा

सोचा नही अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नही
माँगा खुदासे रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नही

सोचा तुझे, देखा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे,
मेरी खता, मेरी वफ़ा, तेरी खता, कुछ भी नही

जिसपर हमारी आँखने मोती बिछाएं रातभर,
भेजा वोही काग़ज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नही


एक शामकी दहलीज़ पर बैठे रहे देर तक
आँखोसे की बातें बहोत मुँहसे कहा कुछ भी नही
-
बशीर बद्र

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